हक
....... સંગીતા ભટ્ટ
हक ही नहीं मुझकोसिर्फ़ बने रहो ।
बन के बिगडे,
बिगड के संभले,
संभल कर गीरे,
गीर के संभले,
ऐैसा कुछ करते रहो ॥
बाल घने काले ...
उमड घुमड कर बादल,
गिरे झरने कल-कल
फ़िर भी हक इस पानी का,
करे मन के मद को अचल-विचल ॥
अाँँख का का़जल गहन
जलाये इतनी तपन,
अडोस-पडोस के शूलों की चुभन,
गरमी की लू , चाँद की शीतलता,
कानों मे गूंजे नदीयों की व्हिवलता,
अब रुके, अब गीरे
सिसकीयों के घूंटों सा.